Wednesday, November 19, 2008

बर्फीले रेगिस्तान सियाचिन का सफर (२)

खारदूँगला में हमें दोपहर के दो बज चुके थे और सियाचिन बैस कैम्प के लिए हमें लम्बा रास्ता तय करना था । इसलिए तेजी से हम आगे बढे। खारदूँगला से कुछ दूरी पर ही नोर्थ पुलु में सेना का कैम्प था जहा हमे दोपहर के खाने के लिए रुकना था। यहां हमारे लिए खाने का बेहतरीन इतंजाम सेना ने किया था। ये कैम्प समुद्र तल से सोलह हजार मीटर की ऊँचाई पर है। सियाचिन जाने वाले सैनिको को भी ऊंचाई की आदत डालने के लिए कुछ दिनो तक यहां रखा जाता है।

यहां से आगे शुरु होती है नुब्रा घाटी। ये घाटी खारदूंगला से लेकर सियाचिन बैस कैम्प तक फैली हुइ है। सियाचिन ग्लेशियर से निकलने वाली नुब्रा नदी के नाम पर ही इस घाटी का नाम रखा गया है। नुब्रा के साथ ही इस घाटी मे श्योक नदी भी बहती है। लगभग पूरे ही रास्ते सडक के एक और नदी का साथ लगातार बना ही रहता है।


घाटी में दूर दूर फैले छोटे छोटे गांव नजर आते हैं। दस बीस घर या उससे भी कम घरों के छोटे गांव । घरो की खासियत ये कि इनके चारों और ही खेत बने होते हैं जिनमें जरुरत के लायक अनाज उगाया जाता है। गायों की तरह खेतों में याक चरते नजर आते हैं। याक वहां के लोगों के लिए कामधेनू कि तरह से हैं जिससे का हर सामान इस्तेमाल किया जाता है । उसके दूध से लेकर मांस और उन तक।


यहां बुद्ध धर्म का साफ प्रभाव नजर आता है हर जगह पूजा के लिए धर्म चक्र लगे होते हैं। गांव के लोग बडे ही भोले भाले नजर आते हैं।




नुब्रा घाटी लेह से कुछ अलग लगती है लेह में जहां हरियाली दिखाई नहीं देती वही यहां पर नदी के किनारे पर पेड और झाडियां दिखाई देते हैं। ये पेड यहां के सूनेपन मे जिंदगी का अहसास सा भरते नजर आते है।


लद्दाख का स्थानिय फल सी-बक-थोर्न भी इस घाटी में दिखाई देता है। इसे लेह बेरी के नाम से भी जानते है। ये एक कांटेदार झाडी पर लगने वाला फल है। जो स्वाद में थोडी खट्टा होता है । लेकिन हैल्थ के लिए इसका जूस अच्छा माना जाता है। आजकल लेह बैरी के नाम से इसका जूस बाजार में मिल भी रहा है। लोगों नें इसके बागान भी लगाये हैजिससे इलाके के लोगो को रोजगार भी मिल रहा है।




इस इलाका के मजा लेते हुए हम रात को करीब नौ बजे सियाचिन बैस कैम्प पहुचे । यहां बर्फबारी ने हमारा स्वागत किया। ठंड भी बहुत ज्यादा थी। इसलिए खाना खा कर सभी लोग सोने के लिए चले गये।
यहां पहली बार हमे स्लीपिंग बैग में सोना पडा क्योकि वहां कि भंयकर ठंड का भगाने का और कोई जरिया नही है। कमरो को गर्म रखन के लिए यहां केरोसिन तेल से जलने वाले रुम हीटर का इस्तेमाल किया जाता है जिसे बुखारी कहते हैं। लेकिन रात को बुखारी को बंद कर दिया जाता है।

बैस कैम्प में हमे सेना के माउंटनियरिंग संस्थान में ठहराया गया था । अगले दिन सुबह से ही हमे अगले चार दिनों तक हमें यहीं पर ग्लेशियर पर चढने की ट्रेनिग लेनी थी।
पहला दिन शुरु हो गया। हमें दिखाया गया कि क्या क्या ले कर जाना है। पहनने के लिए विशेष जैकेट ( आस्ट्रिया के बने) ,थर्मल इनर वियर( ये ऐसा समान था जो डीआरडीओ ने बनाया था अच्छा लगा कि कुछ देश में भी बना है।) , स्लिपिंग बैग, बर्फ में पहनने के जूते ( इटली के बने), धूप का चश्मा( अमेरिकी नजर से सियाचिन देखना था)। इसके अलावा आईस एक्स, रस्सियां, और रुकसैक ।
देख कर लगा कि इतना सामान कैसे लेकर जायेगें क्योकि खूद ही ये सब लेकर चढाई करनी थी।




सारे सामान का वजन पन्द्रह किलो से ज्यादा होने वाला था । मेरे जैसे पतले दुबले आदमी के लिए ये तो बहुत था । खैर ये सब तो उठाना ही था। पहला दिन तो इस सब मे ही बीत गया। असली खेल तो अगले दिन से होना था। अगले दिन अपने सामान के साथ हमें पांच किलोमीटर चढाई करनी थी।




Thursday, November 13, 2008

बर्फीले रेगिस्तान सियाचिन का सफर (१)

अभी भारतीय सेना के साथ सियाचिन जाने का मौका मिला। ये ऐसा मौका था जो जिंदगी में किस्मत वालों को ही मिलता है। मैने तो तुरन्त हां कर दी। दरअसल भारतीय सेना लगातार दूसरे साल आम लोगों के दल को लेकर सियाचिन जा रही थी। जिसमें मिडिया के साथ ही सेना के तीनो अंगो के अधिकारी , आम नागरिक और सैनिक स्कूल के बच्चे शामिल थे।

ये पूरे एक महीने का सफर था जिसमें पहले कुछ दिन हमें लेह में बिताने थे जहां पर रहकर हमें वहां के वाताबरण में अपने आप को ढालना था। दल में कुल मिलाकर करीब पैंतीस लोग शामिल हुए। सफर की शुरुआत हुई चंडीगढ से जहां से बायुसेना के विशाल मालवाहक जहाज ए एन ३२ से सभी लोगो को लेह तक जाना था। ये दुनिया के सबसे बडे जहाजो में से एक है जिसमें बै‌ठना अलग ही अनुभव रहा हालांकि मैं इस सफर में साथ नहीं था हां लेह से बापसी में मैने इस जहाज से सफर किया। कुछ कारणो से मै दो तीन दिन बाद लेह जा पाया ।



लेकिन दिल्ली से लेह का हवाई सफर भी कम रोमाचक नहीं है। इस पूरी उडान में लगभग एक घंटा लगता है। आधे घंटे बाद ही आप हिमाचल के रोहतांग दर्रे पर होते हैं और उसके बाद शूरू होता है बर्फ से ढके पहाडों का सिलसिला जो उपर से देखने में बेहद शानदार लगता है। आप भी देखिये इन नजारों को.............................





सुबह करीब सात बजे हमारा विमान लेह में उतरा। पायलेट पहले ही बता चुके थे कि बाहर का तापमान दो डिग्री है सुनते ही मुझे तो ठंड लगने लगी क्योकि दिल्ली में तो तापमान चालिस के पार था और में तो टी शर्ट में ही था। उतरते ही तेज धूप से सामना हुआ मैने धूप का चश्मा लगा लिया । लेह में चश्मा लगाना बेहद जरुरी है लेकिन मेरा सामान आने में काफी देर लग गई और तब तक मै कापने लगा था । खैर सामने आने के बाद मैने जैकेट पहनी । लेह हवाई अड्डा बेहद छोटा है।




बाहर आते ही मै तो दूरर्दशन केन्द्र चला गया जो सामने ही था । यही से सेना का गाडी मुझे लेकर कारु चली गई। जो लेह से करीब चालीस किलोमीटर दूर लेह मनाली रोड पर सेना का कैम्प है। ये कैम्प सिन्धु नदी के किनारे बना है।




इस महान नदी को देखने का मेरा पहला अवसर था जिसके नाम पर ही हमारे देश को पहचान मिली है। शाम को देर तक मै इसके किनारे पर बैठा रहा। शाम के साथ ही ठंड भी बढने लगी थी।











अगले दिन ही हमे सियाचिन बैस कैम्प के लिए निकलना था जो कि लेह से दौ सो किलोमीटर दूर था। अगले दिन सुबह ही तैयार हो कर हम लेह पहुचे जहां हमारी रवानगी से पहले सेना ने छोटा सा कार्यक्रम रखा था। वहां फ्लैग आफ के बाद करीब बारह बजे हम सियाचिन बैस कैम्प के लिए चल दिये। साथ के सभी लोग पिछले पांच दिनो से लेह मे ही थे इसलिए सभी जगह घूम चुके थे मुझे तो गाडी से ही देखकर काम चलाना पडा।





लेह से निकलते ही आस पास की खूबसूरती दिखाई देने लगती है। दूर दूर तक सूने पहाड दिखाई देते है हरियाली का कही कोई नामों निशान नही है। इतनी ऊचाई पर ठंड औक बर्फ के सिवाये कुछ नही दिखाई देता है। लेकिन इन सूने पहाडो की अलग ही सुन्दरता है।

































खैर लेह से चलने के दो घंटे बाद हम पहुचे खारदूंगला जो कि दुनिया मे सबसे ऊंचाई पर बनी सडक है। करीब १८३८० फीट पर है खारदूगला। जब हम यहां पहुचे तो बेहद ठंड पड रही थी यहा का तापमान शून्य से दस डिग्री नीचे था। साथ ही भारी बर्फ भी पड रही थी । यहा हमें पता चला कि आगे मौसम और भी खराब हो रहा है। कुछ देर यहां रुक कर हम आगे चल दिये................

Monday, November 10, 2008

डीडी न्यूज पर देखिये सियाचिन की जिंदगी

आज रात दस बजकर तीस मिन‍ट पर देखिये सियाचिन और वहां की जिंदगी पर खास कार्यक्रम- सियाचिन एक झलक बर्फीली जिंदगी की। मैं पिछले महीने सियाचिन के सफर पर गया था । वहां हमारे दल ने पन्द्रह हजार फीट की उंचाई पर सियाचिन के बेस कैम्प तीन तक की चढाई की थी। ये कार्यक्रम हमारे सफर और वहा रह रहे सेना के जवानों पर है।

Saturday, November 1, 2008

सियाचिन और लद्दाख का सफर

पिछले काफी दिनो से ब्लाग की दुनिया से दूर था। लेकिन क्या करू यायावर हूँ इस बार एक महीने के लिए लद्दाख और सियाचिन के सफर पर चला गया था। पिछला पूरा महीना ही लद्दाख और सियाचिन की वादियो पर बिता कर बापस आया हूँ। जल्द आपने इस सफर के बारे में ब्लाग पर लिखूँगा। उससे पहले डीडी न्यूज पर सोमवार तीन नवम्बर को रात दस बजकर तीस मिनट पर देखिये सियाचिन के सफर पर मेरा विशेष कार्यक्रम- सियाचिन का सफर। ये अगले शनिबार को दोपहर तीन बजे फिर से दिखाया जायेगा।

Monday, September 1, 2008

छोटे ल्हासा मैक्लोडगंज धर्मशाला की सैर (२)

शाम को हम पहुँचे नामग्याल मठ लेकिन मठ के दरवाजे पर आकर ही मैं ठिटक गया। मठ के दरवाजे पर तिब्बत की आजादी के सघर्ष के फोटो लगाये गये थे। चीन के अत्याचार की कहानी उनसे साफ नजर आ रही थी।

उसको देखते हुए हम आगे बढे और मठ के अन्दर पहुँचे तो वहां भी विरोध के वही स्वर दिखाई दे रहे थे। चारो और चीन विरोधी नारे लिखे गये थे। कुछ तस्वारे तो इतनी ज्यादा भयानक थी कि देखा ही नहीं जा रहा था।






खैर हम चले मठ को देखने के लिए। मठ में देखने के लिए दो मुख्य मंदिर हैं जिनमे से एक कालचक्र मंदिर है और दूसरा भगवान बुद्ध का है। मंदिर अंदर से निहायत ही खूबसूरत हैं। मूर्तियों को सोने के रंग से रंगा गया था।






तिब्बत की पूरी कला वहां नजर आती है। दीवारों पर तिब्बत की मशहूर थंका चित्रकारी की गई थी जो देखने के लायक है। उन मूर्तियो की खूबसूरती से आंखें हटाने का मन ही नहीं करता है।



थोडी देर में हम मंदिर देख कर बाहर निकले मंदिर के चारो और तिब्बती चक्र लगे हैं। इनमें लाखों की संख्या में मंत्र लिख कर रखे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन चक्रों को एक बार घूमाने से ही लाखों मंत्रों का फल मिल जाता है।


मंदिर के सामने के बरामदे में लोग बौद्ध तरीको से प्रार्थना और ध्यान कर रहे थे। सिर्फ तिब्बती ही नही वहां बडी संख्या में विदेशी भी थे जो ध्यान और प्रार्थना कर रहे थे। बरामदे के सामने से धौलाधार की पहाडियो को बडा ही सुन्दर नजारा दिखाई दे रहा था। हल्की हल्की बरसात भी हो रही थी ऐसे में घाटी से उठते बादलो को देखना दिल लुभाने वाला अनुभव था।
हम बहुत देर तक वहां खडे होकर तस्वीरें उतारते रहे। उसके बाद हम मठ की निचली मंजिल पर पहुँचे। शाम को वहां का नजारा ही बदला हुआ था । वहां बडी संख्या में बौद्ध भिक्षु धर्म और दर्शन पर चर्चा कर रहे थे।



उनका चर्चा करने का तरीका बडा ही अलग था। वही तरीका देखने के लायक था। दो या तीन भिक्षु एक साथ बैठकर किसी विषय पर बात करते हैं जिसमें से एक खडी रहता है जो बोलने के साथ ही हाथो से इशारे भी करता रहता है। इसको पूरी तरह से समझाया नहीं जा सकता है इसे देखने के लिए खुद आपको ही धर्मशाला जाना होगा।



मठ में हम कुछ घंटे बिता चुके थे जब शाम घिरने लगी तो हम बाहर चल दिये ।मठ के बाहर एक बार फिर तिब्बती विरोध दिखाई दिया। शाम को बडीं संख्या में तिब्बती आजादी के समर्थन में पूजा यात्रा निकाल रहे थे। हाथों में मोमबत्ती लिये ये लोग अपना शांत विरोध जता रहे थे।



वहां से निकल कर हम मैक्लोडगंज के बस अड्डे पहुँचे जो यहां का मुख्य चौक भी है। इसी चौक से एक सडक मठ की तरफ जाती है जिसे टेम्पल रोड कहा जाता है। इसी से लगी हुई दुसरी सडक है जिसे जोगीवारा रोड कहा जाता है।





दोनो ही सडको पर तिब्बती सामान की दुकाने हैं। यहां से बौद्ध पूजा का सामान और तरह तरह के वाद्य यंत्र खरीदे जा सकते हैं। तिब्बत की मशहूर थंका चित्र भी यहां से खरीद सकते हैं।





मुझे यहां पर कीमती पत्थरों से बने आभूषण लगभग हर दुकान पर बिकते दिखाई दिये। जोगीवारा सडक पर घुसते ही एक दुकान है जहां तिब्बती कपडे बनाये जाते हैं जहा से आप तिब्बती कपडे अपने हिसाब से खरीद सकते हैं।



साथ ही जोगीवारा सडक पर खाने के रेस्टोरेंट भी बडी संख्या में हैं जहा तिब्बती के साथ ही इटालियन और फ्रेच खाना भी खाया जा सकता है।
मैनें अच्छे तिब्बती रेस्टोरेंट का पता किया। तो पता चला कि स्नो लायन तिब्बती खाने के लिए अच्छी जगह है। ये भी जोगीवारा सडक पर घुसते ही है। यहां मैने मोमो खाये जो बाकई बेहतरीन था। हर तरह का तिब्बती खाना यहां मिलता है। इसलिए अगर घूमने आये है तो यहां जरुर आईये।
यहां के मैन्यू अलग चीज मुझे दिखाई दी सेब की चाय जो वाकई एक अलग स्वाद था । खा पीकर बाहर निकले तब तक रात के आठ बज चुके थे। बाजार देखते हुए होटल पहुँचे कुछ आराम करके खाना खाया और सोने के लिए चले गये ।
अगले दिन सुबह से ही बरसात हो रही थी इसलिए बाहर नहीं निकले और होटल में ही आराम किया। बारह बजे तक हमने होटल से चैक आउट किया। तब तक बरसात भी ऱुक चुकी थी हमारी वापसी की बस भी रात के आठ बजे थी इसलिए हम एक बार फिर मठ की तरफ चल दिये ।
उस मठ में कुछ ऐसी बात है जो आप को अपनी और खींचती है। वापस जाकर हमने जी भर के फोटो खींचे । दो तीन घंटे बिताकर होटल वापस आये और खाना खाकर सामान लेकर वहां से चल पडे। रास्ते में फिर स्नोलायन पर रुके इस बार मैने बनाना केक और तिब्बती चाय का मजा लिया। तब तक शाम के चार बज चुके थे।

तो हमने बस अड्डे से निचले धर्मशाला के लिए बस पकड ली क्योकि हमारी बस निचले धर्मशाला से ही थी। चलते चलते मेरी नजर इस दुकान पर पडी जो पिछ्ले डेढ सौ साल से इसी जगह पर कमोबेश इसी हालत में हैं। ये सब चीजे हैं जो किसी जगह को आम घूमने के इलाको से अलग बनाती है। वहां से बस लेकर इस जगह को अलविदा कर हम चल दिये ।

कहां ठहरे-
हिमाचल पर्यटन का होटल भागसू रुकने के लिए अच्छी जगह है। जहां नौसौ से दो हजार तक के कमरे हैं। इसी के पास पर्यटन विभाग ने नया क्लब हाउस बनाया है जहां जो रुकने के लिए अच्छा है। क्लब में डोरमैट्री सुविधा भी है। इसके अलावा होटल बडी संख्या मैं हैं जहां हर बजट के हिसाब से कमरे मिल जाते हैं।
क्या खायें-
होटल भागसू का खाना काफी अच्छा है । इसकी खासियत है कि पहले से बताकर यहां हिमाचली खाना बनवाया जा सकता है। तिब्बती खाने के लिए होटल भागसू के सामने पेमाथांग और जोगीवारा रोड पर स्नोलाईन रेस्टोरेंट में जाया जा सकता है। इटालियन के लिए स्नोलायन के पास ही निक्स ईटालियन किचन है।

Thursday, August 28, 2008

धर्मशाला मैक्लोडगंज की तस्वीर.....

मैक्लोडगंज की ये फोटो देखिये फोटो दूर से ली गई है। इसमें तिब्बती मठ के साथ पूरा मैक्लोडगंज नजर आ रहा है।

Monday, August 25, 2008

छोटे ल्हासा मैक्लोडगंज धर्मशाला की सैर (१)

कश्मीर से घूम कर आये लगभग दो महीने होने वाले थे। मेरा मन फिर कही जाने के लिए मचलने लगा था । तभी अगस्त में दो तीन दिन की छुट्टी भी मिल गई। अब तो मैं आस पास जगह तलाश करनें लगा जहां घूमने जाया जा सके। काफी दिनो से मेरा मन हिमाचल जाने का कर रहा था तो मैने धर्मशाला जाना तय किया। एक दोस्त भी चलने को तैयार हो गया।

हिमाचल पर्यटन के दिल्ली आफिस में फोन कर सारी जानकारी ले ली। हम दोनो तेरह की शाम को धर्मशाला के लिए निकल पडे। लेकिन मेरे दोस्त सुभाष को अपने आफिस से निकलने में देर हो गई। शाम को सात के बाद ही हम निकल पाये।
मैं पहले पता कर चुका थी कि आठ बजे वोल्वो बस चलती है लेकिन देर से निकलने के कारण हम उस में नहीं जा पाये। बस अड्डे पर पता चला कि अब तो हिमाचल की साधारण बस सेवा में ही जाना होगा। लगभग तेरह घंटे की यात्रा थी लेकिन जाना तो था ही इसलिए बैठ गये ।

करीब नौ बजे हमारी बस चल पडी। दिल्ली से निकलते ही मौसम नें रंग बदलना शुरु कर दिया और तेज बरसात होने लगी। रात को करीब दो बजे हम लोग चंडीगढ पहुंच गये। चंडीगढ के बाद तो मुझे नींद आने लगी था जब आंख खुली तो पता चली कि हम हिमाचल में उना से आगे निकल चुके हैं। थोडी ही देर में पहाड भी शुरु हो गये। हांलाकि बरसात को रुक चुकी थी लेकिन पहाड अभी भी भीगे हुए थे।

बस से हरी भरी वादियों को देखना आखो को चैन दे रहा था। मन में खुशी हो रही थी कि एक बार फिर में दिल्ली की दौड भाग से दूर आ गया हूँ। रास्ते में नौ देवियों में से एक चिन्तपूर्णी देवी का मन्दिर भी पडा।
आखिर कार करीब सुबह के दस बजे हमारी बस धर्मशाला पहूँच ही गई। लेकिन हमारी मंजिल ये नहीं थी ब्लकि हमें तो बहां से दस किलोमीटर दूर मैक्लोडगंज जाना था । जहां दलाई लामा रहा करते हैं।

दरअसल धर्मशाला के दो हिस्से हैं एक है निचला धर्मशाला जो करीब तेरह सौ मीटर की उँचाई पर है और दूसरा है ऊपरी धर्मशाला जो करीब अठारह सौ मी़टर की ऊँचाई पर है। ऊपरी धर्मशाला में साठ के दशक में तिब्बत से निर्वासित तिब्बती लोग रहे है जो कि दलाई लामा के साथ भारत आ गये थे। ज्यादातर पर्यटक ऊपरी धर्मशाला में ही जाते हैं क्योकि वहां अलग तरह कि बौद्द संस्कृति देखन को मिलती है। इसी ऊपरी धर्मशाला को मैक्लोडगंज कहा जाता है।



तो हमे धर्मशाला के बस अड्डे से ही मैक्लोडगंज के लिए बस मिल गई। रास्ता बेहद ही खूबसूरत था पूरा इलाका ही देबदार और चीड के जंगलों से भरा पडा है। आधे ही घंटे में हम मैक्लोडगंज आ गये। हल्की हल्की बरसात भी होने लगी थी कुल मिलाकर पहाड पर मस्ती करन का पूरा माहौल था वहा पर।



सबसे पहले तो हमने होटल लेने की सोची। दिल्ली से ही हिमाचल पर्यटन के होटल भागसू के बारे में पता कर लिया था । इसलिए बस से उतरते ही होटल के लिए चल पडे को बस अ़ड्डे से पास ही था। होटल पहाड के एक किनारे पर देवदार के जंगल के बीच बना था इतनी शानदार जगह थी कि होटल के एरिया में घुसते ही मन खुश हो गया।




हमें एक कमरा भी वहां मिल ही गया एक ही खाली था। कमरा लेकर हम थोडी ही देर मे तैयार हो गये धर्मशाला को छानने के लिए। लेकिन तब तक इतनी तेज बरसात होने लगी कि बाहर निकलना मुश्किल हो गया । तो क्या करते बालकनी मे बैठकर ही निहारने लगा। खैर दो बजे तक बरसात हल्की होने लगी तो हम बाहर निकले।
होटल से पता किर लिया था कि आस पास क्या है देखने के लिए । बाहर आकर फिर से हम बस अड्डे पर आये ये यहा का मुख्य इलाका है जहां से घूमने के लिए टैक्सी या ओटो लिया जा सकता है। ये बहुत ही छोटी जगह है और पैदल भी घूमा जा सकता है। लेकिन बरसात के कारण हमने एक ओटो कर लिया । पहली बार किसी हिल स्टेशन पर मैं ओटो देख रहा था इसलिए ओटो ही कर लिया घूमने के लिए।


ओटो से घूमने के लिए तीन सौ और टैक्सी से करीब चार सौ रुपये लगते हैं। हम ओटो से निकल पडे मैक्लोडगंज की सैर पर , पहाड पर ओटो सो घूमने में अलग ही मजा आ रहा था। हरे भरे देवदार के जंगल के बीच से होते हुए हम सबसे पहले पहुँचे नडी गांव।ये गांव करीब दो किलोमीटर दुर है। अगर आप पैदल जाना चाहें तो जा सकते हैं।


उस गांव से उँचे पहाडों का सुन्दर नजारा देखने को मिलता है इसलिए पर्यटन विभाग गांव को विकसित कर रहा है। वाकई यहां से सामने के ऊंचे पहाडो का बढिया नजारा हमें देखन को मिला। हल्की बरसात में हम पास के जंगल की सैर पर निकल गये ।



थोडी देर तक नजारे लेकर हम चले अगली मंजिल डल लेक की तरफ ये एक छोटी सी झील है । झील छोटी जरुर है लेकिन चारो तरफ से देवदार के जंगल से घिरी है । झील के चारों तरफ घूमने के लिए रास्ता बनाया गया है। झील में आस पास के कई झरनो का पानी मिलता है। हल्की बरसात औऱ झील का किनारा माहौल को रोमांटिक बना रहा था।




झील को देखने के बाद हम चले सेंट जान चर्च को देखने के लिए। इस चर्च को अठारह सौ बावन में बनाया गया था। ये उत्तर भारत के सबसे पुराने चर्च में से एक हैं । छोटा सा चर्च बाकई देखने के लायक है । घने जंगल से घिरा है चर्च का पूरा इलाका।


चर्च बंद होने के कारण हम इसके अंदर नहीं जा सके लेकिन चर्च की खिडकियो में स्टेंड ग्लास की सुन्दर काम किया गया है। इसे देखन के लिए आप को रविवार को जाना होगा क्योकि रविवार को पूजा के लिए चर्च खुलता है।

चर्च में एक पुराना कब्रिस्तान भी है जिसकी खासियत ये है कि यहां भारत के वायसराय लार्ड एल्गिन को दफनाया गया है जिनकी अठारह सो तिरेसठ में घोडे से गिरकर मौत हो गई थी। ये चर्च धर्मशाला और मैक्लोडगंज के रास्ते के बीच में है।



अब हम चले भागसू नाग मन्दिर देखने के लिए जो कस्बे से एक किलोमीटर की दूरी पर है। भगवान शिव के इस मन्दिर की बहुत मान्यता है। मन्दिर के पास की झरना निकलता है जिसे पवित्र माना जाता है। मन्दिर से सामने की घाटी का सुन्दर नजारा देखने को मिलता है।





मन्दिर से करीब डेढ किलोमीटर की चढाई के बाद एक और झरना है। बरसात के मौसम में तेजी से गिरते पानी को देखना मन में रोमांच भर देता है। झरने के तेजी से गिरते पानी ने धुंध बना रखी थी। वहां पहुचते ही पानी में घुस कर फोटो खिंचवाये। झरने के पानी में भीगते भीगते ही फोटो खिचवाये और वापस चल पडे।




झरने को देखने के बाद हमारा अगला ठिकाना था नामग्याल मठ जिसे तिब्बत से आये लोगों ने बनाया है। इस मठ के साथ मैक्लोडगंज की जिंदगी का पूरा सफर अगली बार..........